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मंगलाचरण (Manglacharan) : वास्तविक अर्थ और आध्यात्मिक महत्त्व

ग्रंथ का आरंभ जैसा कि हमारी परंपरा है मंगलाचरण से करते हैं यह जो मंगलाचरण की परंपरा है यह वैसे तो मुख्य रूप से सनातन धर्म में देखने को मिलती है लेकिन किसी ना किसी रूप में अन्यत्र भी यह परंपरा है, मंगलाचरण माने क्या होता है तो व्यक्ति कुछ ना कुछ आचरण करता है आचरण चरण माने होता है चलना तो उसमें आ लग गया तो आचरण हो गया लोग कहते हैं ना कि इनकी चाल कैसी है तो चाल माने हमारा जो व्यवहार है हमारे शरीर की जो शरीर का चलन है इंद्रियों का चलन है विचारों का चलन है तो यह आचरण कहलाता है व्यक्ति किसी ना किसी रूप में प्रवृत्ति करता है व प्रवृत्ति ही आचरण है लोग कहते हैं कि व्यक्ति को अपना आचरण सात्विक रखना चाहिए तो हमारे शास्त्रों ने आचरण की एक ऐसी व्यवस्था बनाई बोले कि व्यक्ति को यदि कोई बड़ा कार्य करना है कोई महत कार्य करना है तो कार्य के आरंभ में उसका आचरण कैसा होना चाहिए बोले उसका आचरण ऐसा हो जो मंगल प्रदान करने वाला हो तो किसी महत कार्य में प्रवृत्ति से पूर्व ऐसा आचरण जो मंगल देने वाला हो वह आचरण मंगलाचरण कहलाता है तो जैसे कोई विद्यार्थी है वह कहीं साक्षात्कार के लिए गया इंटरव्यू के लिए गया वहां पर इंटरव्यू लेने वालों का एक पैनल है दो तीन लोग बैठे हैं वहां जाने पर जो पहला इंप्रेशन है जो पहला उसका प्रभाव है वह उन साक्षात्कार लेने वालों के चित्त में किस प्रकार का पड़ता है यह निर्धारित करेगा उसका प्रारंभिक आचरण मैंने जब वो उस सभा में गया उन लोगों के सम्मुख उपस्थित हुआ हुआ तो उस समय वह उनका अभिवादन करता है या बिना अभिवादन किए वह जाकर के बैठ जाता है उस समय उसके चेहरे का हाव भाव कैसा है और अभिवादन करता भी है तो अभिवादन का स्वरूप क्या है वो केवल हाथ जोड़ लेता है कि प्रणाम करता है हाथ जोड़ना और प्रणाम करना भी उसकी मुस्कुराहट के साथ होता है ने उस समय उसकी मुख मुद्रा कैसी है जब वह चलकर गया तो उसकी चाल कैसी थी बिल्कुल भागते दौड़ते गया या बड़ी शालीनता के साथ गया यह सब बड़ी सूक्ष्म चीजें हैं लेकिन बड़ी महत्त्वपूर्ण है यह सब भी तो मैटर करती हैं इनका अपना एक प्रभाव है तो जब भी हम किसी बड़े के सन्मुख उपस्थित हुए तो वह हमारी उपस्थिति का ढंग कैसा था यह निर्धारित करेगा कि फिर उनके मन में हमारे प्रति किस तरह का भाव जागेगा तो हम उनके सन्मुख उपस्थित हुए हमारा व्यवहार बिल्कुल ही अमर्यादित था तो महाराज उनका जो मूड है वो शुरू में ही हमने बिगाड़ दिया अब उसके बाद चाहे हम बहुत अच्छी बातें करें बहुत विद्वता पूर्ण बातें करें लेकिन वह जो हमारा पहला प्रभाव है वह फिर उनके हृदय में हमारे प्रति उस तरह का वात्सल्य उस तरह की मधुरता को संपादित नहीं कर पाएगा फिर हम कितना ही इंप्रेस करने की कोशिश करें लेकिन वह बात बनेगी नहीं एक व्यक्ति की सभ्यता की पहचान यह है कि वह किसी के सन्मुख किस तरह से प्रस्तुत होता है उसकी जो बिल्कुल बाह्य प्रस्तुति है वह उसके आचरण का बाह्य रूप है तो आप देखिए किसी को बहु बहुत बड़ा कार्य करना है वेदांत विद्या पर कुछ लिखना है या अध्यात्म के विषय पर कोई बात करनी है तो बात करने से पूर्व उसका कैसा आचरण होना चाहिए बोले आचरण ऐसा हो जो कि उसके अंदर की विनम्रता को अभिव्यक्त करने वाला हो कोई भी बड़ा कार्य करने वाला व्यक्ति अभिमानी नहीं हो सकता है विनम्र होगा उसी के अंदर भगवत कृपा से कोई सामर्थ्य प्रकट होती है कि वह कोई महत कार्य कर सके यह विनम्रता की अभिव्यक्ति देखने में बड़ी छोटी लगती है लेकिन इसका जो कार्य है वह बहुत बड़ा है तो हम बड़ों के सामने होते हैं तो किस तरह का आचरण करते हैं किस तरह की वाणी का प्रयोग करते हैं यह सब चीजें बहुत महत्व की हैं वो चाहे भले हमारी उन सब नादानियां को भुला कर के हमें प्रेम दें हमें स्नेह दें लेकिन जो अपना आचरण है वह बहुत सात्विक होना चाहिए क्योंकि वह उनके हृदय के उस वात्सल्य को प्रभावित करता है वह सहज धारा को अवरुद्ध करता है तो हमारे सभी शास्त्रों में ये परंपरा देखने को मिलती है कि ग्रंथ आरंभ करने से पहले वह आचार्य मंगलाचरण करते हैं और मंगलाचरण में मुख्य रूप से स्तुति रूप मंगलाचरण देखने को मिलता है वो प्रार्थना के रूप में होता है और उसमें ये अभिव्यक्ति होती है यह जो कुछ भी मैं करने जा रहा हूं यह मेरे अपने सामर्थ्य से नहीं हो रहा है यह आपके अनुग्रह से हो रहा है तो जो कृतज्ञ हो जाना है यह महाराज बहुत बड़ा मंगलाचरण है

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